अरसे से देखा ख्वाब अब पूरा हो गया चाहने लगा था शाम से देखो अब सवेरा हो गया ।
"महफ़िल-ए-मौश़िकी" इक ऐसा जरिय़ा हैं िजसके दरमिय़ाॅं हम अपनी बात रखते हैं शाय़री، ग़जल और कविताओ के माध्यम से । हमारा मकसद यह कतई भी नही होना चाइये की कोई जाति विशेष,कोई धर्मं विशेष या फिर कोई व्यक्ति विशेष आह़त हो या उनकी भावनाओ को ठेस पहुचे। अगर एेसा कभी भुलवश होता भी हैं तो हम तहदिल से क्षमाप्रार्थी है। हम सदैव आपके लिये कुछ बेहतर लिखने का प्रयास करेंगे। उम्मीद करता हु की आप भी हमें स्नेह और प्यार देंगें। ...